गारे–पेलमा में उबल रहा जनाक्रोश — ठिठुरन में भी नहीं डगमगा रहा आदिवासियों का संकल्प



पेसा क्षेत्र की जनता का शांतिपूर्ण विरोध, लेकिन प्रशासन की चेतावनी से बढ़ा तनाव — जनसुनवाई के खिलाफ 24 घंटे से धरना जारी

रायगढ़। गारे–पेलमा सेक्टर–1 में प्रस्तावित पर्यावरणीय जनसुनवाई को लेकर बीते दो दिनों से जिस उथल-पुथल की आहट थी, वह अब खुलकर जनआक्रोश के रूप में सामने आ गई है। पेसा क्षेत्र के ग्रामीण, आदिवासी समाज और प्रभावित गाँवों की महिलाएँ–पुरुष पिछले 24 घंटे से भी अधिक समय से खुले आसमान के नीचे ठिठुरती ठंड में धरना दे रहे हैं, और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ दिखाई दे रहे हैं।


धरना स्थल पर ग्रामीणों की एक ही मांग गूंज रही है—
“बिना सहमति, बिना जानकारी… जनजमीन और जंगल पर कोई निर्णय मंजूर नहीं!”
इधर, शांतिपूर्ण आंदोलन के बीच प्रशासन द्वारा जारी किया गया वह पत्र ग्रामीणों में आग की चिंगारी की तरह भड़क उठा है, जिसमें जनसुनवाई में बाधा डालने पर BNS की कार्रवाई का संकेत दिया गया है। आदिवासी समाज ने इसे उनकी आवाज दबाने की कोशिश बताया है।


ग्रामीणों का कहना है कि केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 14 सितंबर 2022 को जारी निर्देश के बावजूद वे क्षेत्र की वास्तविक परिस्थितियों को नजरअंदाज कर जनसुनवाई को आगे बढ़ा रहे हैं। लोगों ने स्पष्ट कहा कि यह जनसुनवाई “औपचारिकता निभाने” जैसी है, न कि जनता की राय जानने का लोकतांत्रिक प्रयास।
धरना स्थल पर शामिल बुजुर्गों ने कहा,
“हम जंगल–पहाड़–नदी से जुड़े लोग हैं… हमारी जमीन हमारी माँ है। इसे छीने जाने नहीं देंगे, चाहे कितनी भी सर्द रातें क्यों न काटनी पड़ें।”
महिलाएँ भी पूरी मजबूती से विरोध में शामिल हैं। उनका कहना है कि खनन के कारण उनके जलस्रोत, खेती की जमीन और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बर्बाद हो जाएगा। युवाओं ने प्रशासन की चेतावनी को “डराने की कोशिश” बताया और कहा कि वे हिंसा नहीं, शांतिपूर्ण तरीके से अपना अधिकार मांग रहे हैं।
जनसुनवाई से पहले ही गारे–पलमा क्षेत्र में माहौल तनावपूर्ण है, लेकिन ग्रामीणों का संकल्प अटूट—
“अधिकारों पर किसी का दबाव नहीं चलेगा, पेसा कानून की रक्षा के लिए अंतिम सांस तक साथ रहेंगे।”

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