ग्राम की अस्मिता बनाम शहरीकरण का दबाव: बासनपाली ने ग्रामसभा से दिया साफ़ संदेश—नगर पंचायत नहीं चाहिए

रायगढ़,तमनार।
विकास के नाम पर लिए जाने वाले फैसले जब गांव की जड़ों को हिलाने लगें, तब प्रतिरोध स्वाभाविक हो जाता है। कुछ ऐसा ही दृश्य तमनार विकासखंड के ग्राम पंचायत बासनपाली में देखने को मिला, जहां विशेष ग्रामसभा का आयोजन कर ग्रामीणों ने एक सुर में नगर पंचायत के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। सैकड़ों की संख्या में जुटे ग्रामीणों ने साफ शब्दों में कहा—बासनपाली ग्राम पंचायत था, है और रहेगा।

दरअसल, तमनार के साथ बासनपाली को जोड़कर नगर पंचायत बनाए जाने की तैयारी चल रही थी। इस प्रस्ताव की भनक लगते ही गांव में हलचल तेज हो गई। ग्रामीणों का मानना है कि नगर पंचायत का दर्जा विकास की गारंटी नहीं, बल्कि उनकी स्वशासन व्यवस्था, परंपरागत अधिकारों और सामाजिक ढांचे पर सीधा प्रहार है। इसी आशंका को लेकर विशेष ग्रामसभा बुलाई गई, जहां चर्चा के बाद सर्वसम्मति से नगर पंचायत नहीं बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया।

ग्रामसभा में यह बात बार-बार उभर कर सामने आई कि बासनपाली अनुसूचित क्षेत्र में आता है और यह आदिवासी बाहुल्य इलाका है। यहां पेसा कानून केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन की रीढ़ है। बैठक के दौरान पेसा कानून के नियमों का पाठन किया गया और ग्रामीणों को बताया गया कि ग्रामसभा सर्वोच्च संस्था है, जिसके अधिकारों को नगर पंचायत बनने की स्थिति में गंभीर क्षति पहुंच सकती है।

ग्रामीणों ने ग्राम पंचायत और नगर पंचायत के फर्क को भी गहराई से समझा। ग्राम पंचायत में जहां निर्णय स्थानीय जरूरतों और परंपराओं के अनुरूप लिए जाते हैं, वहीं नगर पंचायत बनने पर नौकरशाही का दखल बढ़ जाता है। जमीन उपयोग, कर व्यवस्था, भवन निर्माण, संसाधनों पर अधिकार—इन सभी मामलों में गांव की सीधी भागीदारी सीमित हो जाती है। यही कारण है कि ग्रामीणों ने इसे विकास नहीं, बल्कि नियंत्रण के रूप में देखा।

बैठक में मौजूद कई वक्ताओं ने आशंका जताई कि नगर पंचायत बनने के बाद करों का बोझ बढ़ेगा, जमीन की कीमतें तो बढ़ेंगी लेकिन जमीन पर गांव का अधिकार कमजोर होगा। बाहरी निवेश और बसाहट से स्थानीय लोगों के हाशिये पर जाने का खतरा भी बताया गया। खासकर आदिवासी समुदाय के लिए यह चिंता और गहरी है, क्योंकि उनकी आजीविका सीधे तौर पर जमीन और जंगल से जुड़ी हुई है।

ग्रामसभा में यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि यदि प्रशासन ने ग्रामीणों की इच्छा के विरुद्ध नगर पंचायत बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई, तो इसका विरोध केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगा। जरूरत पड़ी तो न्यायालय की शरण ली जाएगी। प्रभावित ग्रामीणों ने कानूनी लड़ाई के साथ-साथ जनआंदोलन छेड़ने का संकेत दिया है। तमनार क्षेत्र में इस मुद्दे को लेकर व्यापक जनआंदोलन की शुरुआत के संकेत भी इसी बैठक से मिले।

इस विशेष ग्रामसभा ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि विकास आखिर किसके लिए और किसकी सहमति से। बासनपाली के ग्रामीणों ने यह साफ कर दिया है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ऐसा विकास जो उनकी पहचान, अधिकार और स्वशासन को खत्म करे—उसे वे किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे।

बासनपाली की यह ग्रामसभा केवल एक गांव का फैसला नहीं, बल्कि पूरे तमनार क्षेत्र के लिए संदेश है। संदेश यह कि कागजी योजनाओं से पहले जमीन की आवाज सुनी जाए। वरना आने वाले दिनों में यह मुद्दा एक गांव से निकलकर पूरे इलाके का आंदोलन बन सकता है।

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